गुणसूत्र क्या है परिभाषा what is chromosome definition

गुणसूत्र क्या है परिभाषा what is chromosome definition

हैलो नमस्कार दोस्तों आपका बहुत - बहुत स्वागत है, इस लेख गुणसूत्र क्या है परिभाषा (what is chromosome definition) में।

दोस्तों इस लेख में आप गुणसूत्र क्या है? गुणसूत्र की संरचना एवं कार्य. गुणसूत्र की परिभाषा संरचना तथा कार्य जानेंगे। तो आइये दोस्तों शुरू करते है, यह लेख गुणसूत्र क्या है परिभाषा:-


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गुणसूत्र क्या है परिभाषा


गुणसूत्र क्या है what is chromosome

क्रोमोसोम क्या है- कोशिका के केंद्रक के न्यूक्लियोप्लाज्म में महीने धागों का जाल फैला रहता है, जिन्हें क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) कहा जाता है और इस जाल को क्रोमेटिन नेटवर्क (Chromatin network) के नाम से जानते हैं।

जब कोशिका का विभाजन (Cell Division) होता है, तब यही धागे संकुचित और वृद्धि करने के पश्चात गुणसूत्र (Chromosome) कहलाते हैं।

गुणसूत्र की खोज 1875 में सर्वप्रथम ट्रांसबर्गर (Transburger) नामक वैज्ञानिक ने कोशिका विभाजन का अध्ययन करते समय केंद्रक (Nucleus) के अंदर की थी,

जबकि इन संरचनाओं को गुणसूत्र नाम वाल्डेयर (waldair) ने 1888 दिया था। सभी जीवधारियों में गुणसूत्रों की संख्या स्थिर रहती है।

पौधों में सबसे कम गुणसूत्र म्यूकर हीमेलिस में 2n=1 गुणसूत्र जबकि सबसे अधिक गुणसूत्र ऑफियोग्लॉसम रिटीकुलेटम में 2n=1260 गुणसूत्र पाए जाते हैं।


गुणसूत्र की परिभाषा Definition of Chromosome 

गुणसूत्र एक सम्बद्ध प्रोटीन के चारों और लिपटे डीएनए (DNA) का वह संगठित क्रम है, जो कोशिका के केंद्रक के द्रव्य में धागेनुमा संरचना के रूप में पाया जाता है,

जिनकी संख्या भिन्न - भिन्न जीवों में अलग-अलग संख्या में होती है। जैसे:- मनुष्यों में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं, जिनमें 22 जोड़े क्रमांकित गुणसूत्र, जिन्हें ऑटोसोम (Autosomes) कहा जाता है, और एक जोड़ी सेक्स गुणसूत्र, X और Y होते है।


गुणसूत्रों का परिमाण Chromosome ka Pariman 

कोशिका विभाजन के समय गुणसूत्रों का परिमाण बदलता रहता है। कोशिका विभाजन की अंतराअवस्था में गुणसूत्र पतले लचीले और संकुचनशील धागों के समान दिखाई देते हैं,

जबकि एनाफेज अवस्था तक इनके सेंट्रोमियर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। इसलिए सेंट्रोमियर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्रों को निम्न प्रकारों में बांटा गया है:-

  1. टीलोसेंट्रिक (Telocentric) - यह गुणसूत्र छड़ के आकार का होता है, क्योंकि इसमें केवल एक ही भुजा होती है तथा भुजा के किनारे पर एक सेंट्रोमियर उपस्थित रहता है।
  2. एक्रोसेंट्रिक (Acrocentric) - एक्रोसेंट्रिक गुणसूत्र भी छड़ के आकार के ही होते हैं, किंतु इनमें दो भुजाएँ होती हैं, जिनमें एक भुजा तो अधिक लंबी होती है, किंतु दूसरी भुजा छोटी होती है। इस कारण से सेंट्रोमियर की स्थिति सबटर्मिनल (Sub-terminal) हो जाती है।
  3. सबमैटासेंट्रिक (Submetacentric) - यह गुणसूत्र L या उल्टे J अक्षरों के समान दिखाई देते हैं। इनमें एक भुजा लंबी और दूसरी भुजा छोटी होती है तथा सेंट्रोमियर इन दोनों भुजाओं के मध्य में स्थित होता है।
  4. मेटासेंट्रिक (Metacentric) - यह गुणसूत्र V अक्षर के आकार का दिखाई देता है। इन गुणसूत्र की दोनों भुजाओं की लंबाई एक समान होती है, तथा सेंट्रोमियर दोनों भुजाओं के मध्य में होता है।

गुणसूत्र की संरचना Structure of Chromosome 

गुणसूत्र की संरचना को निम्न बिंदुओं के आधार पर स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:- 

  • क्रोमेटिड़ या क्रोमोनिमेटा Chromatids or chromonemata

जब मेटाफेज अवस्था में गुणसूत्रों को देखा जाता है, तब गुणसूत्र दो इकाइयों में दिखाई देते हैं, जिन्हें अर्ध गुणसूत्र या फिर क्रोमेटिड्स के नाम से जाना जाता है। यह क्रोमेटिड्स

आपस में सेंट्रोमियर के द्वारा जुड़े हुए रहते हैं। प्रत्येक क्रोमेटिड्स के आधार द्रव्य के अंदर पूरी लंबाई में कुंडलित तंतु पाए जाते हैं,

जिनको क्रोमोनिमेटा कहा जाता है। यह क्रोमोनिमेटा न्यूक्लियोप्रोटीन के धागों के रूप में होते हैं, इन्हें के ऊपर जीन (Jean) रैखिक क्रम में व्यवस्थित रहते हैं।

  • सेंट्रोमियर Centromere

यह गुणसूत्र के दोनों अर्थ गुणसूत्रों को आपस में जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पार्ट होता है, जिसे काइनेटोमियर भी कहा जाता है। सक्रेडर ने कहा है,

कि सेंट्रोमियर किसी भी गुणसूत्र का वह घना और परिवर्तित भाग होता है, जहाँ पर गुणसूत्र के गुणसूत्रीय तंतु आपस में जुड़े रहते हैं।

सभी प्रकार के गुणसूत्रों में सेंट्रोमियर की स्थिति निश्चित होती है। सेंट्रोमियर के द्वारा ही गुणसूत्रों के आकार का निर्धारण होता है तथा गुणसूत्र का सकरा और स्थाई भाग कहलाता है।

कोशिका विभाजन (Cell Division) के समय गुणसूत्रों का तुर्क तंतुओं पर विन्यास एवं चलन सेंट्रोमियर के द्वारा ही नियंत्रित होता है।


सेंट्रोमियर की परासंरचना Centromere anatomy

सेंट्रोमियर एक्रोमेटिक रचना के रूप में होता है। अगर इसको इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखा जाये, तो यह प्लेट या डिस्क के समान नजर आता है।

सेंट्रोमियर का व्यास लगभग 0.20 माइक्रोन से 0.25 माइक्रोन तक हो सकता है। सेंट्रोमियर के मध्य मे दानेदार संरचनाएँ पाई जाती हैं,

जिन्हें सेंट्रोमेरिक क्रोमोमियर्स कहा जाता है और तुर्क तंतु इन्हीं कणिकाओं से जुड़ते हैं। इस भाग में क्रोमिनिमेटा अकुंडलित होते हैं, सेंट्रोमियर की अनुप्रस्थ काट देखने पर स्थित निम्न भाग दिखाई देते हैं।

  1. बाहरी भाग - इस भाग को सेंट्रोमेरिक प्लेट के नाम से जाना जाता है, जो अधिक घना होता है, तथा इसकी मोटाई 30 से 40 nm तक हो सकती है।
  2. मध्य भाग - इस भाग को कोरोना या शीर्ष भाग भी कहते हैं, जो सेंट्रोमियर का पारदर्शी भाग होता है।
  3. आंतरिक भाग - सेंट्रोमियर के आंतरिक भाग की मोटाई 15 से 30 nm तक हो सकती है।

सेंट्रोमियर के कार्य Function of Centromere 

सेंट्रोमियर का कार्य कोशिका विभाजन के समय गुणसूत्रों को तुर्क तंतुओ से जोड़ने का होता है, क्योंकि यह तुर्क तंतुओं में गुणसूत्रों के चलन में सहायक होते हैं।

इसके साथ ही सेंट्रोमियर एक विशेष प्रकार की प्रोटीन ट्यूबलीन का निर्माण करता है, जो तुर्क तंतुओ के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाती है।

  • द्वितीयक संकीर्णन Secondary narrowing

कुछ गुणसूत्र ऐसे हैं, जिनमें सेंट्रोमियर के अलावा द्वितीयक संकीर्णन पाए जाते हैं, जो दो प्रकार के होते हैं। द्वितीयक संकीर्णन-1 द्वितीयक संकीर्णन-2

द्वितीयक संकीर्णन-1 न्यूक्लियोलस के निर्माण से संबंधित रहता है, इसलिए इसको न्यूक्लियोलर संगठक कहते हैं। गुणसूत्रों के कुल

डीएनए का लगभग 0.3% द्वितीयक संकीर्णन-1 मैं पाया जाता है, वही द्वितीयक संकीर्णन-2 को ट्रेबेंट या सेटेलाइट कहते हैं।

  • सैटेलाइट Satellite

द्वितीयक संकीर्णन-1 के आगे का आने वाला भाग सैटेलाइट के नाम से जाना जाता है, जो गोलाकार या फिर घूंडीनुमा होता है,

जो क्रोमोटिन के महीन तंतुओ की सहायता से गुणसूत्रों से जुड़ा रहता है। इनको ट्रेबेंट भी कहा जाता है, तथा सैटेलाइट युक्त गुणसूत्रों को सेट SAT गुणसूत्र कहते हैं। 

  • टीलोमीटर्स Telometers

टीलोमीटर्स गुणसूत्रों के स्तरों पर पाए जाते हैं, तथा गुणसूत्रों की ध्रुवता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिसके कारण ही गुणसूत्र किसी अन्य गुणसूत्र या खंड से नहीं जुड़ सकते।


गुणसूत्रों के कार्य Function of Chromosome 

गुणसूत्र प्राणी के जीवन में विभिन्न प्रकार की जैविक क्रियाओं का नियंत्रण करते हैं, प्राणी में उत्पन्न लक्षणों का परिवर्तन नियंत्रण करना आदि होता है।

केंद्रिका के निर्माण में हेटरोक्रोमेटिक क्षेत्र प्रमुख रूप से अपनी भूमिका निभाता है। गुणसूत्रों की संख्या एवं संरचना में परिवर्तन के साथ-साथ नए परिवर्तित लक्षण भी प्रकट होते हैं।

दोस्तों यहाँ पर आपने गुणसूत्र क्या है परिभाषा (what is chromosome definition) कार्य, संरचना आदि के बारे में पढ़ा। आशा करता हुँ, आपको यह लेख अच्छा लगा होगा।

  • इसे भी पढ़े:-

  1. प्रोकैरियोटिक तथा युकैरियोटिक कोशिका में अंतर
  2. कोशिका झिल्ली किसे कहते है, संरचना तथा कार्य
  3. राइबोसोम क्या है खोज तथा कार्य

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